एक बार फिर सरकार से ठनने वाली है! जंतर-मंतर पर एक बार फिर बैठना भी पड़ेगा ये तय है! जनलोकपाल समिति की कल की बैठक के बाद जो सामने आया वो अकल्पनीय नहीं है! आशंका पहले से थी! सरकारी नुमाइंदे वही कर रहे है जो उन्हें करना था! बेशार्मों को शर्म तो आती नहीं! घोटाले पे घोटाले किए जा रहे हैं और सीनाज़ोरी भी किए जा रहे हैं! अब तो उन्होंने जनलोकपाल विधेयक के हिमायतियों की मुहिम की हवा निकालने के लिए नया दलाल भी तैयार कर लिया है! रामदेव वही तो कर रहा है! रामदेव को और कुछ नहीं चाहिए! रामदेव की एक ही मंशा है, उसके साम्राज्य को कोई ना छेड़े! रामदेव एक बिज़्नेसमॅन है! घाघ बिज़्नेसमॅन! गेरुए वस्त्रा, लंबी दाढ़ी और योग के पीछे एक शातिर कारोबारी! उसके शिविर मे जाने की फीस सुनेंगे तो दिमाग़ खराब हो जाएगा! एक साम्राज्य स्थापित कर लिया है और अब अपनी राजनीति चमकने मे लगा है! दिग्विजय और रामदेव की नूरा कुश्ती सबके सामने है! दोनों ने मिलकर जो कुछ किया उसका बस एक ही उद्देश्य है, मुद्दे को इतना तूल दे दो, ऐसी-ऐसी बे सिर-पैर की बातों में उलझाओं की उसकी गंभीरता ही ख़तम हो जाए!
भ्रष्टाचार का विष राजनीति और समाज में इस कदर गहरे उतर चुका है की एक व्यापक और सिस्टेमिक इलाज़ की ज़रूरत है! और इसके लिए हर किसी की ज़िम्मेदारी का तय होना ज़रूरी है!
क्या करे हम एक ईमानदार प्राधानमंत्री का जिसके पास इतनी इक्षाशक्ति नहीं की ग़लत को ग़लत कह सके! उनकी नाक के नीचे 2जी घोटाला होता है, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला होता है, आदर्श के नाम पर कैसा आदर्श पेश होता है ये जगजाहिर है! बिपक्ष मे वो नैतिक बल ही नहीं रह गया है की वो ग़लतियों पर उंगली रख सके!
राजनीतिक नेतृत्व मे कोई नहीं हैं जो डॉवा कर सके की उसकी कमीज़ अब भी सफेद है! किस पर गबन या पद के दुरुपयोग का इल्ज़ाम नहीं है! लालू-मुलायम-माया-सुषमा-येदीयूर्रप्पा-नरेंद्र मोदी-कॉंग्रेस-भाजपा-राजद-सपा-बसपा-दिनाकरण-सौमित्रा सेन-पीजे थॉमस-कलमाडी-भनोट-राजा-कनिमोझी-मोरानी-बालवा-चंद्रा-गोयनका-हसन अली-अशोक चव्हान-देशमुख और ना जाने कौन कौन! हम्माम में सभी नंगे है! इन नंगों और तथाकथित ईमानदारों का गठजोड़ क्यों कर लोगों के सामने अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने लगा! क्यों कर जनता को अधिकार देने लगा! क्यों अपनी बनी-बनाई लंका को खुद आग लगाने लगा!
मीडीया बूम के इस दौर में सब-कुछ हाइजॅक हो सकता है अगर सावधानी ना बरती गई तो! सरकार से निर्णायक लड़ाई तो बाकी है ये पहले दिन से पता था! अब वक़्त आ गया है! राजनीतिक वर्ग और सरकार किसी कीमत पे अपने उपर लगाम लगाने को तैयार नहीं हो सकते! अन्ना और हमारी ज़िम्मेदारी अब और बढ जाती है! लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी! लड़ाई को दूर-दराज तक पहुँचना होगा! केवल जंतर-मंतर पे बैठने भर से काम नहीं चलेगा! मुहिम चौतरफ़ा चलानी होगी! सामना उस तंत्र से है जिसमे काले अँग्रेज़ों ने लोकतंत्र पे कब्जा जमा लिया है! जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होने का हवाला दे कर अब और लूट की इजाज़त हम नहीं दे सकते! हमें हमारा लोकतंत्र वापस लेना होगा, हर कीमत पर लेना होगा! आख़िर हम कब तक चुप बैठे रहेंगे!
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